नफरत की नगरी में मोहब्बत की मिसाल

हमारा खून एक जैसा है और मेरी मोहब्बत किसी जाति या धर्म तक सीमित नहीं है

नफरत की नगरी में मोहब्बत की मिसाल

हमारा खून एक जैसा है और मेरी मोहब्बत किसी जाति या धर्म तक सीमित नहीं है

जिस उत्तर प्रदेश में धार्मिक दंगो का इतिहास पुराना रहा है ! साल 2011 से  2015 तक छोटे बड़े कुल 703 दंगो की रिपोर्ट है ! जिसने 176 लोगो की जान ले ली ! हल में मुज़फ्फरनगर में हुए दंगो ने देश को हिला कर रख दिया जिसमे करीब 62 लोग मरे गए और 50000 से ज़्यादा लोग बेघर हुए ! इसका बाद भी उत्तर प्रदेश में छोटी छोटी घटनाये होती रहती हैं ! ऐसे में वहाँ की फिज़ाओ में मोहब्बत की उम्मीद करना बेमानी है ! पर इतना सब कुछ होने के बाद भी कुछ लोगो के अंदर इंसानियत आज भी ज़िंदा है ! ऐसे ही एक इंसान है 80 साल के मोहम्मद शरीफ ! जो पिछले 25 सालों से फैजाबाद में लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं. वह पूरे अयोध्या में शरीफ चाचा के नाम से मशहूर हैं.वो कहते है हम हिंदू और मुस्लिम दोनों की मिट्टी गले से लगाते हैं और यह लोग सबको अलग करना चाहते हैं !

कौन हैं शरीफ चाचा ?

मोहम्मद शरीफ पेशे से साइकल मेकैनिक हैं पर वो रोज़ाना कब्रिस्तान और शमशान भूमि के बीच चक्कर काटते रहते हैं. और जो लावारिस लाश उन्हें मिलती है उसका अंतिम संस्कार धार्मिक रीती रिवाज से करते हैं ! इन शवों में कुछ हिंदुओं के होते हैं तो कुछ मुस्लिमों के. शरीफ चाचा शवों के साथ भेदभाव नहीं करते. शरीफ चाचा अब तक 1600 लावारिस लाशो का अंतिम संस्कार धार्मिक रीती रिवाज से कर चुके हैं ! वो उत्तर प्रदेश के तनाव भरे माहौल में गंगा जमना तहज़ीब की एक मिसाल हैं !  मोहम्मद शरीफ के पूरे कपड़े मिट्टी से बिगड़े होते हैं जब वह ताडवाली तकिया कब्रिस्तान में मिट्टी के टीलों को पार करते हुए एक हरे रंग से पुते कमरे में पहुंचते हैं.
  इस कमरे के बाहर तीन बोर्ड टंगे हैं जिस पर लिखा है ‘लावारिस मय्यतमाटी का गुसलखाना’. वह चुपचाप दरवाजा खोल कर कमरे में जाते हैं जहां वह सैकड़ों शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं. यह शवों में कुछ हिंदुओं के होते हैं तो कुछ मुस्लिमों के. शरीफ चाचा शवों के साथ भेदभाव नहीं करते.
                                                नफरत की राजनीतिक की वजह से शरीफ चाचा बहुत नाराज़ हैं वो राजनीतिक दलों से नाराजगी जताते हुए कहते हैं , ‘ नफरत की भाषा वोट के चक्कर में नेता लोग बोलते हैं पर मेरी इज्जत तो हिंदुओं के कारण ही बढ़ी है. हमारा खून एक जैसा है और मेरी मोहब्बत किसी जाति या धर्म तक सीमित नहीं है.’ शरीफ चाचा के इस काम को बहुत सरे सरकारों और गैर-सरकारी संस्थाओं ने सराहा है ! उन्हें बहुत से संस्थाओं से प्रशस्ति पत्र मिल चुके हैं. 

                                                        फैज़ाबाद के Buddhist priest Dr. Karuna Sheel कहते हैं ''मैं शरीफ चाचा को क़ुरान की उन आयतो पैर खरा उतरता हुआ पता हूँ  , जहा इंसानियत की बात कही गयी है,(I find Shareef Chacha living in the spirit of all those verses of the Holy Quraan which talk about Humanity)”

रामजन्मभूमि मंदिर के पुजारी Satyendra Das कहते हैं Shareef चाचा के बारे में कहते हैं .
A typical day for Shareef Chacha starts with a visit to the local mortuary, hospital, railway tracks and every place where he can locate any unclaimed body. 

              If he finds any unclaimed dead body then he himself gives it a bath and makes all the arrangement necessary as per the faith of the dead.

जब शरीफ से यह पूछा गया कि आखिर उन्होंने सेवा का यही तरीका क्यों चुना? तो शरीफ ‘चाचा’ फरवरी 1992 में अपने बेटे की मौत को याद करते हुए कहते हैं, ‘मोहम्मद रईस खान मेरा बड़ा बेटा था जो केमिस्ट के तौर पर काम करने के लिए सुल्तानपुर गया था लेकिन एक महीने तक गायब रहा. उस समय रामजन्मभूमि का विवाद चल रहा था जिसके कारण 1992 में बाबरी मस्जिद ढहा दी गई. बाद में, एक बोरे से रईस की लाश मिली. उसकी हत्या कर दी गई थी. बस तभी से मैंने यह फैसला किया कि अब किसी भी लावारिस लाश को सड़क पर नहीं सड़ने दूंगा.
                    मोहम्मद शरीफ तभी से अपने कुछ पड़ोसियों के सहयोग से यह मानव सेवा का काम कर रहे हैं. हालांकि इस सेवा में वह पैसे की कमी से भी जूझते हैं लेकिन वह कैश में दिया गया दान और कफन ही होते हैं जिसके जरिए शरीफ चाचा यह सेवा कर पा रहे हैं. हमारा संविधान हर नागरिक को इज्जत देने की बात कहता है. शरीफ चाचा अपने काम से इस आदर्श को जिन्दा रखे हुए हैं.

कुछ पत्रकारों Syed Ali Akhtar, Shah Alam, Ghufran Khan and Shariq Haider नक़वी  ने मिल कर एक डॉक्यूमेंट्री भी बनिए !  the director of “Rising from the Ashes” and student of Mass Communication Research Center, Jamia Millia इस्लामिया का कहना है हम शरीफ चाचा के इस काम को दुनिया के सामने लाना चाहते हैं और ‘Faizabad-Ayodhya” को धार्मिक नफरत की पहचान से अलग पहचान देना चाहते हैं ! अख्तर कहते हैं उसके पास इतना बजट नहीं ही की वो इस डॉक्यूमेंट्री को दुनिया के सामने ला सके इसलिए उन्होंने इस फील्ड पे काम करने वाले कई  NGO 's को भी पत्र लिखा पर किसी ने भी सहायता के लिए हाथ नहीं बढ़ाया ! 

Any body interested in the screening of this 17-minute-long documentary can contact Ali Akhtar at 09871511120 and saakhtar1988@gmail.com

Sharif chacha Faizabad

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