Irom Sharmila इरोम चानू शर्मिला या "इरोम शर्मिला" कौन हैं ?

एक 28 वर्षीय लकड़ी ने एक ऐसे कानून के विरोध में 16 साल तक अनशन दिया जिस कानून के अनुसार सेना किसी को भी देखते ही मार सकती है या बिना वारेंट के गिरफ्तार कर सकती है !

Irom Sharmila इरोम चानू शर्मिला या "इरोम शर्मिला" कौन हैं ?

एक 28 वर्षीय लकड़ी ने एक ऐसे कानून के विरोध में 16 साल तक अनशन दिया जिस कानून के अनुसार सेना किसी को भी देखते ही मार सकती है या बिना वारेंट के गिरफ्तार कर सकती है !

मणिपुर में सांप्रदायिक दंगो का इतिहास बहुत पुराना है ! यहाँ कई जाती समुदाय के लोग रहते हैं ! मणिपुर साल 1949 में भारत का हिस्सा बना पर इससे एक राज्य का दर्ज साल 1972 में मिला ! दरअसल मणिपुर जातीय आइतबार से दो हिस्सो में बता हुआ है ! दो हिस्सो में बाटने की असल वजह जातीय और सांस्कृतिक है ! पहाड़ों के हिस्सो पर नागा रहते हैं ! पहाड़ों  पे रहने वाले नागा लोग कैथोलिक धर्म को मानते हैं.नागा जनजाति समुदाय की 32 जनजातियां हैं जिनमे सबसे शक्तिशाली तांगखुल नागा हैं. पहाड़ पांच ज़िलों में बंटा है जो मणिपुर की कुल ज़मीन का 90 प्रतिशत है. पहाड़ों पर रहने वालों के प्रशासन के लिए स्वायत्त जिला परिषद (एडीसी) हैं. इस कानून के अनुसार राज्य सरकार एडीसी के अनुमोदन के बग़ैर कोई क़ानून नहीं पास कर सकती.
                                  मणिपुर का दूसरा हिस्सा है घाटी का जो नागा आबादी वाले पहाड़ों से घिरा है. ये राज्य की भूमि का केवल 10 प्रतिशत है, लेकिन इसकी आबादी पहाड़ों पर रहने वाली जनजाति से थोड़ी अधिक है. घाटी चार ज़िलों में विभाजित है. घाटी में रहने वालो के धर्म भी अलग हैं पहाड़ों पहाड़ों पर रहने वाले अगर कैथोलिक धर्म के अनुयायी हैं तो घाटी की बड़ी आबादी हिंदू है, जिनमें वैष्णव हिंदू अधिक है, इन्हें मेतेई समुदाय के नाम से जाना जाता है. राज्य सरकार, पुलिस और नौकरशाही में घाटी के हिंदुओं का बहुमत है.

Irom Sharmila इरोम चानू शर्मिला या "इरोम शर्मिला" कौन हैं ?

तारीख 2 नवम्बर 2000 में इंफाल के पास मालोम गाँव में सैनिकों की गोलीबारी में 10 नागरिक मारे गए थे. इस गोलीबारी का दुनिया पर कोई असर शायद नहीं हुआ हो पर एक लड़की पर इसका गहरा असर हुआ और उसने राष्टपिता महात्मा गाँधी के नक़्शे कदम पर चलने की ठान ली और शुरू कर दी एक ऐसी भूख हड़ताल जिसकी उम्मीद एक २८ वर्षीय युवा से नहीं की जा सकती ! इसका लड़की का नाम है इरोम चानू शर्मिला या "इरोम शर्मिला" ! इरोम चानू शर्मिला मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, जो पूर्वोत्तर राज्यों में लागू सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम, 1958 [आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट (एएफएसपीए)] को हटाने के लिए लगभग 16 वर्षों तक (4 नवम्बर 2000 से 9 अगस्त 2016 ) भूख हड़ताल पर रहीं।एएफएसपीए के तहत जो की पूर्वोत्तर राज्यों में लागू है  सुरक्षा बलों को ये अधिकार है की वो किसी को भी देखते ही गोली मर सकते हैं या बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं। शर्मिला इसके खिलाफ इम्फाल के जस्ट पीस फाउंडेशन नामक गैर सरकारी संगठन से जुड़कर भूख हड़ताल करती रहीं। सरकार ने शर्मिला को आत्महत्या के प्रयास में गिरफ्तार कर लिया था। क्योंकि यह गिरफ्तारी एक साल से अधिक नहीं हो सकती अतः हर साल उन्हें रिहा करते ही दोबारा गिरफ्तार कर लिया जाता था।

शुरूआती जीवन !

इरोम का जन्म मणिपुर के एक साधारण से परिवार में हुआ था ! स्कूली पढ़ाई-लिखाई में ज़्यादा मन नहीं लगता था 10वीं किया पर 12वीं पास नहीं कर पाईं. पर उन्हें लिखना बहुत पसंद था कविता लिखने में रूचि थी और कभी कभी अख़बार में लेख लिख लेती थीं. मणिपुर की स्थिति को देखकर चितन करती थी ! साधारण सा जीवन बीत रहा था ! इसी बीच मानवाधिकर संगठन से वो जुड़ गईं. अक्सर इन्हें मानवाधिकार संगठनों की बैठकों में देखा जाता था वो एक युवा वोलंयटिर की हैसियत से जाती थी ! पर चुपचाप बैठी रहती थीं. 

भूख हड़ताल कैसे शुरू हुआ ?

जब 2 नवंबर 2000 में वो घटना हुई जिसमे मणिपुर की राजधानी इंफाल के मालोम में असम राइफल्स के जवानों के हाथों 10 बेगुनाह लोग मारे गए थे। जिसने इरोम की ज़िदंगी हमेशा के लिए बदल दी.इरोम अब चुप बैठना नहीं चाहती थी उन्होंने ने मन ही मन एक फ़ैसला किया. किसी को कुछ नहीं बताया. बस माँ के पास गईं और कहा माँ मुझे आर्शिवाद दो मैं किसी अहम काम के लिए जा रही हूँ. वो भूख हड़ताल पर बैठ गई. पर उस समय कोई भी ये समझ नहीं रहा था की ये क्या हो रहा है ! मालोम गाँव के लोग भी नहीं चाहते थे कि इरोम वहाँ भूख हड़ताल करें. उन्हें इस बात का दर था कही इस वजह से कोई और मुसीबत न आ जाये ! कुछ बिनो बाद ही उनके परिवार को भी पता चल पाया की वो अफ़्सपा न हटाने तक भूख हड़ताल करने का फ़ैसला लिया है. वो उस समय एक युवा थी उम्र थी केवल 28 साल ! तब इस छोटे से गॉव में न मिडिया था न कोई जनसमर्थन ! कुछ दिनों बाद लोगो ने भी ध्यान देना छोड़ दिया ! जब तीन-चार साल लंबा समय बीत गया तब जा कर लोगो और मीडिया का ध्यान इस ओर खिंचा ! भूख हड़ताल लंबी खिचने की बाद इरोम पर आत्महत्या करने का आरोप लगा और उन्हें हिरासत में ले लिया गया. 16 सालों से उनकी ज़िंदगी का एक बंधा-बंधाया रूटीन रहा है.हर 15 दिन बाद अस्पताल के वार्ड से कोर्ट का चक्कर, जज का वही सवाल कि क्या आप व्रत तोड़ेगीं, इरोम का सधा-सधाया जवाब, नहीं.

कैसे ज़िंदा हैं बिना कुछ खाये ?

उन्हें जबरन नाक में डाली गई ट्यूब के ज़रिये खिलाया-पिलाया जा रहा है..इंफाल स्थित जवाहरलाल नेहरू अस्पताल का एक विशेष वार्ड उनकी जेल के रूप में काम करता है !

कब तोडा अनशन ?

जब उन्हें ये महसूस होने लगा इस अनशन से उनका कोई सुनने वाला नहीं उनका कहना था ''उन्हें नहीं लगता उनके अनशन से आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पॉवर्स एक्ट-AFSPA आफ्सपा हट पाएगा' तब इरोम ने 9 अगस्त 2016 करीब 4 बजकर 20 मिनट पर शहद पीकर अनशन तोड़ा. उसके बाद वो काफी भावुक हो गईं और रोने लगीं इरोम ने कहा कि वे अभी अपनी मां से नहीं मिलेंगी क्योंकि उनका मकसद अभी पूरा नहीं हुआ है. लेकिन वो लड़ाई जारी रखेंगी. शर्मिला ने कहा कि वो राजनीति में आकर लड़ाई जारी रखेंगी. मणिपुर में विधानसभा चुनाव 2017 में होना है .

                                                      इरोम ने मणिपुर की राजधानी इंफाल में 18 Oct 2016 को पीपल्स रिसर्जेंस जस्टिस एलायंस (प्रजा) नामक नई राजनीतिक पार्टी का एलान किया.अब इसके बैनर तले चुनाव लड़ कर वह अगले साल मणिपुर के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना चाहती हैं ताकि राज्य से विशेषाधिकार अधिनियम को खत्म किया जा सके. उन्होंने कहा, "हम मणिपुर में एक नया राजनीतिक बदलाव लाना चाहते हैं जहां सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम जैसे काले कानूनों से आम लोगों को परेशान नहीं किया जा सकेगा."

Irom Sharmila AFSPA manipur

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