POTA पोटा (आतंकवाद निरोधक अध्यादेश) क्या है ?

आतंकवाद से लड़ने के लिए बनाये गए इस कानून के लागु होने के सिर्फ ८ महीनो के (७ राज्य जहा पोटा लागु था ) अंदर करीब ९४० लोगो को गिरफ्तार किया गया जिस वजह से इसकी दुर्पियोग की सम्भावना भी बढ़ गई !

POTA पोटा (आतंकवाद निरोधक अध्यादेश) क्या है ?

आतंकवाद से लड़ने के लिए बनाये गए इस कानून के लागु होने के सिर्फ ८ महीनो के (७ राज्य जहा पोटा लागु था ) अंदर करीब ९४० लोगो को गिरफ्तार किया गया जिस वजह से इसकी दुर्पियोग की सम्भावना भी बढ़ गई !

भारत में आतंकवादी सम्बंधित घटनाओ में ९० के दशक में बहुत बढ़ोतरी हुई ! मार्च 1993 में मुम्बई में हुए बूम धमाको ने लगभग ३०० लोगो की जाने ले ली ! आतंकवाद ये दौर कामो बेश बढ़ता ही चला गया ! इन घटनाओ से लड़ने के लिए भारत सरकार ने एक नया कानून लाया ! जिसे नाम दिया गया Prevention of Terrorism Ordinance शार्ट में POTA पोटा !

POTA पोटा (आतंकवाद निरोधक अध्यादेश) क्या है ?

भारत की केंद्र सरकार आतंकवाद से मुकाबले के लिए कानूनों को और सख्त बनाने के लिए साल 1995 में एक नया कानून जिसे पोटा (आतंकवाद निरोधक अध्यादेश) कहा गया ! इसे इससे पहले बने आतंकवाद निरोधक क़ानून की जगह लेना था ! इससे पहले जो आतंकवाद निरोधक क़ानून था उसे टाडा कहा जाता था ! टाडा (टेररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज) नाम का ये कानून 1985 से 1995 के बीच लागू था.1994 तक इस टाडा में 76166 लोग गिरफ्तार किया जा चुके थे. केवल 4% प्रतिशत लोग ही इसमें अपराधी साबित हुए, लेकिन इस कानून के कड़े प्रावधानों के चलते कई लोग इसमें सालों साल जेल में सड़ते रहे. पर 1995 में इसे ख़त्म कर दिया गया इस कानून की जगह पोटा ने ले ली ! 

                                                          पोटा के राजनीतिक दुरुपयोग को लेकर देश की मुख विपक्षी पाटीयो सहित अन्य विरोधी दलों ने इसकी विरोध शुरू कर दिया था ! यही कारण था कि राज्यसभा में सत्ता पक्ष इसे पास न करवा सका था । उस समय राज्यसभा में कुल 211 सांसद उपस्थित थे । इनमें से पोटा के समर्थन में केवल 98 सासदों ने ही अपना मत दिया । 113 ने इसके विरोध में अपने मत डाले ।इसके बाद सत्तारुढ़ दलों ने संयुक्त अधिवेशन बुलाकर इसे पास करवा लिया । इसके पास होते ही उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने दावा किया था कि इसका मुख्य उद्देश्य सीमा पर से आतंकवाद की चुनौती का मुकाबला करना है । पिछले काफी समय से चर्चित आतंकवाद निरोधक अध्यादेश (पोटा) विधेयक 26 मार्च, 2002 को कानून बन ही गया । इस कानून को 1985 में लागू किये गये टाडा कानून की जगह पर लाया गया है । पोटा 16 अक्टूबर, 2001 को लागू किया गया था । हलाकि पोटा कानून बनने के बाद से देश में आतंकवाद तथा उग्रवाद में वृद्धि ही हुई है पर सरकारें इसे सही मानती है !

आतंकवाद की परिभाषा !

पोटा के तहत ऐसी कोई भी कार्रवाई जिसमें हथियारों या विस्फोटकों का इस्तेमाल हुआ हो या फिर जिसमें किसी की मौत हो या फिर घायल हो जाय तो वह आतंकवादी कार्रवाई मानी जायेगी । इनके अलावा ऐसी हर गतिविधि जिससे किसी सार्वजनिक संपत्ति को नुक़सान पहुंचा हो या सरकारी सेवाओं में बाधा आई हो या फिर उससे देश की एकता और अखंडता को ख़तरा हो, वह भी इसी श्रेणी में आती है.

पुलिस और सरकारी एजेंसियो को मिलते हैं विशेष अधिकार ! 

इस कानून के तहत पुलिस और सरकारी एजेंसियो किसी को भी सिर्फ शक के आधार पर गिरफ्तार कर सकती हैं । इसके तहत पुलिस को यह भी अधिकार है कि वह बिना वारन्ट के किसी की भी तलाशी ले सकती है । टेलीफोन तथा अन्य संचार सुविधाओं पर भी नजर रख सकती है । इसके अतिरिक्त अभियुक्तों के खिलाफ गवाही देने वालों की पहचान छिपायी जा सकती है । आतंकवादियों से संबंध होने के संदेह में अभियुक्त का पासपोर्ट और यात्रा संबंधी कागजात राद्ध किये जा सकते हैं । आरोपी को तीन महीने तक अदालत में आरोप पत्र दाखिल किये बिना ही हिरासत में रखा जा सकता है और उसकी संपत्ति भी जब्त की जा सकती है । 

पोटा में हुए बदलाव !

हालाँकि कई तरफ़ से हुए ज़बरदस्त विरोध के कारण सरकार ने इस विधेयक में तीन बार बदलाव किए हैं.इसकी मियाद पाँच साल से घटा कर तीन साल कर दी गई है. पत्रकारों से संबंधित प्रावधानों में ढील दे दी गई है और संपत्ति ज़ब्त करने के लिए विशेष अदालत की इजाज़त ज़रूरी कर दी गई है. हलाकि समय समय पर इसका विरोध होता रहा है क्यों की इसके दुरूपयोग भी हुए हैं और आगे भी ऐसे दुरूपयोग से इंकार नहीं किया जा सकता !

क्या सजा हो सकती है ?

अगर किसी पे पोटा के तहत लगा अपराध साबित हो जाता है तो उसे कम से कम पाँच साल और अधिक से अधिक मौत की सज़ा दी जा सकती है.

pota macoca tada

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