कौन थे सीमान्त गाँधी ? | Gyan Ki Dukan

पठान जिसे लड़ाकू कौम समझ जाता उसे कोई अहिंसात्मक और शान्तिपीर्ये बना दे तो उसे आप क्या कहेगे !

कौन थे सीमान्त गाँधी ? | Gyan Ki Dukan

पठान जिसे लड़ाकू कौम समझ जाता उसे कोई अहिंसात्मक और शान्तिपीर्ये बना दे तो उसे आप क्या कहेगे !

कौन थे सीमान्त गाँधी ?

जब पुरे भारतीय महादीप पर अंग्रेज़ो का कठोर शासन था ! आम जनता अंग्रेज़ो की गुलामी में अपने जीवन जी रही थी वही पेशावर का पठान परिवार उसके लोहा ले रहा था ! इस परिवार में आबेदुल्ला खान नामक व्यक्ति जोकि सत्यवादी होने के साथ ही साथ लड़ाकू स्वभाव के थे !  पठानी कबीलियों के लिए और भारतीय आजादी के लिए अंग्रेज़ो से बड़ी बड़ी लड़ाइयाँ लड़ रहे थे । उनका पूरा जीवन अंग्रेज़ो से लड़ते ही बिता ! आख़िरकार आजादी की लड़ाई के लिए उन्हें प्राणदंड दिया गया । वे जैसे ताकतवर थे वैसे ही समझदार और चालक भी। ये गुण उनके बेटे सैफुल्ला खान में भी आया ! इन्होंने भी अपने सारा जीवन आज़ादी के लिए निछावर कर दिए ! पूरा जीवन अंग्रेज़ो से लड़ते ही बिता ! जहाँ भी पठानों के ऊपर अंग्रेज हमला करते रहे, वहाँ सैफुल्ला खान उनकी मदद में जाते रहे। इसी परिवार से एक और आज़ादी का चाहने वाला निकल पर इसका रास्ता अलग था ये अहिंसा में विश्वास रखते थे इनका नाम था 'खान अब्दुल गफ्फार खान' जिन्हें “सीमान्त गांधी”, “बच्चा खाँ” तथा “बादशाह खान” के नाम से भी पुकारा जाता है,

शुरूआती जिंदगी

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का जन्म ब्रिटिश इंडिया में पेशावर घाटी के उत्मान जई में एक समृद्ध परिवार मैं हुआ था।ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान के दादा परदादा के स्वभाव के उल्ट उनके पिता बैराम खान का स्वभाव कुछ भिन्न था। उनके पिता बहराम इलाके के एक समृद्ध ज़मींदार थे और स्थानीय पठानों के विरोध के बावजूद उन्होंने अपने दोनों बेटों को अंग्रेजों द्वारा संचालित ‘मिशन स्कूल’ में पढ़ाया। गफ्फार पढ़ाई में होशियार थे और शिक्षा की अहमियत उन्हें  स्कूल में आने पर समझ आने लगी थी । जब हाई स्कूल समाप्त होने वाला था उन्हें अंग्रेजी सरकार के अंतर्गत पश्तून सैनिकों के एक विशेष दस्ते में शामिल होने का प्रस्ताव मिला पर सोच-विचार के बाद उन्होंने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया क्योंकि उन्हें अच्छी तरह से पता था कि इस ‘विशेष दस्ते’ के अधिकारियों को भी उन्ही के देश में द्वीतीय श्रेणी का नागरिक समझा  जाता था।  मिशनरी स्कूल की पढ़ाई समाप्त करने के बाद वे अलीगढ़ गए किंतु वहाँ रहने की तकलीफो की वगह से उनका ज़्यादा समय गावो में ही बिता। गर्मी की छुट्टियाँ में खाली रहने पर समाजसेवा का कार्य करना उनका मुख्य काम था। शिक्षा समाप्त होने के बाद यह देशसेवा में लग गए। साल 1919 में जब अंग्रेज़ो ने फौजी कानून (मार्शल ला) लागु तब इस सीमान्त गांधी ने शांति का प्रस्ताव उपस्थित किया , पर अंग्रेज़ो को ये रास न आया और वो गिरफ्तार किए गए। अंग्रेज़ो ने इसी सामान्य से इनमे एक नायक की छवि देख ली थी अत: उन्होंने एक झूठा आरोप लगा कर इन्हें जेल में बंद रखना चाहा ! उन्हों ने कुछ झूठे गवाह खोजने शुरू किये जिन्हें ये कहना था की खान साहब के बहकाने पर जनता ने तार तोड़े ,पर कोई भी इस झूटी गवाही के लिए राज़ी नहीं हुए जो सरकार की तरफ ये झूठी गवाही दे ! फिर भी इस झूठे आरोप में उन्हें छह मास की सजा दी गई।

सामाजिक जागरूकता और स्वाधीनता आन्दोलन में भूमिका

साल 1930 ई. में जब उन्होंने सत्याग्रह किया तो अंग्रेज़ो ने उन्हें पुन: जेल भेजे दिया और उनका तबादला गुजरात (पंजाब) के जेल में कर दिया गया। इस जेल में पंजाब के बहुत से बंदी पहले से मौजूद थे वहाँ आने पर उनका पंजाब के अन्य राजबंदियों से परिचय हुआ ! जेल में उन्होंने सिख गुरूओं के ग्रंथ पढ़े और गीता का अध्ययन किया। उनका मनना था धार्मिक आधार पर अलग अलग लोग भी एक साथ शांति से रहे सकते हैं ! हिंदु तथा मुसलमानों के आपसी मेल-मिलाप को जरूरी समझकर उन्होंने गुजरात के जेलखाने में गीता तथा कुरान के दर्जे लगाए, जहाँ योग्य संस्कृतज्ञ और मौलवी संबंधित दर्जे को चलाते थे। उनके दर्जे कैदी इतने प्रभावित की सब दर्जे शुरू कर दिया और जेल में मौजूद सरे कैदियों ने गीता, कुरान तथा ग्रंथ साहब आदि सभी ग्रंथों का अध्ययन किया।

साल 1910 में सिर्फ बीस साल की उम्र में खान अब्दुल गफ्फार खान नई अपने गांव उत्मान जई में एक स्कूल खोला और शिक्षा दीक्षा का काम शुरू किये ! देखते ही देखते ये स्कूल कामयाब साबित हुआ ! 1911 में वो पश्तून स्वतंत्रता सेनानी तुरंग जई के हाजी साहेब के स्वाधीनता आन्दोलन में शामिल हुए ! इनके स्कूल से अँगरेज़ सरकार को खतरा महसूस हुआ और साल 1915 गफ्फार खान का स्कूल प्रतिबंधित कर दिया।

खुदाई खिदमतगार संगठन का निर्माण

बाचा खान ने अंग्रेजों के विरुद्ध लगभग सारे विद्रोहों को असफल होते देखा था अतः उन्हें लगा कि सामाजिक चेतना के द्वारा ही पश्तूनों में परिवर्तन लाया जा सकता है। बादशाह खान खान एक ऐसे देश का निर्माण करना चाहते थे जो बिलकुल आज़ाद और धर्मनिरपेक्ष हो जहा सभी धर्म के लोग मिलजुल के रह सके ! इस मकसद को हासिल करने के लिए  बादशाह खान एक संगठन बनाया जिसका नाम था 'खुदाई खिदमतगार' ! कुछ इतिहासकार का मनना है खुदाई खिदमतगार संगठन महात्मा गाँधी के अहिंसा और सत्याग्रह के विचारो से प्रभावित था ! इस सीमान्त गाँधी का कमल के नेतृत्व ने देखते ही देखते इस में संगठन में लगभग 100000 सदस्य शामिल हो गए ! ये संगठन शांतिपूर्वक और अहिंसातकमक विरोध में यकीन रखता था इसलिए इनका अंग्रेजी पुलिस और सेना का विरोध विरोध हमेशा शांतिपूर्ण रहता था ! उसका कार्य शीघ्र ही राजनीतिक कार्य में परिवर्तित हो गया।  खुदाई खिदमतगारों ने हड़तालों, राजनैतिक संगठन और अहिंसात्मक प्रतिरोध के माध्यम से अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ सफलता हासिल की और ‘खईबर-पख्तुन्ख्वा’ में एक प्रमुख राजनैतिक शक्ति बन गये।  बादशाह खान के भाई डॉ खान अब्दुल जब्बर खान इस संगठन राजनैतिक खंड जिम्मेदारी सँभालते थे वह साल 1920 के दशक के अंतिम सालों से लेकर सन 1947 तक प्रान्त के मुख्यमंत्री रहे।

किस्सा ख्वानी नरसंहार

अंग्रेज़ो के ज़ालिमाना हुकूमत में आंदोलनों सत्याग्रह का दौर चलता रहा ! ऐसा ही एक सत्याग्रह था साल 1930 ई. का नमक सत्याग्रह इस दौरान गफ्फार खान को 23 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया गया जिसके स्वरुप खुदाई खिदमतगारों संगठन के सदस्य विरोध प्रदर्शन के लिए पेशावर के किस्सा ख्वानी बाज़ार में इकठ्ठा हुए। अंग्रेजों ने निहत्थी और अहिंसात्मक भीड़ पर मशीनगनों से गोलियां चलाने का आदेश दिया जिसमे लगभग 200 -250 लोग मारे गए। इसी दौरान गढ़वाल राइफल रेजिमेंट के दो प्लाटूनों ने निहत्थी और अहिंसात्मक भीड़ पर गोलियां चलाने से इनकार कर दिया जिसके परिणामस्वरूप उनका कोर्ट मार्शल किया गया और कठोर सजा सुनाई गयी।

कांग्रेस के साथ संबंध

गफ्फार खान और महात्मा गाँधी दोनों अंहिसा में विश्वाश रखते थे इसलिए लिए दोनों के बीच आधात्मिक मित्रत्रा भी थी। दोनों को एक दूसरे के प्रति अपार स्नेह और सम्मान था और दोनों ने सन 1947 तक मिल-जुलकर काम किया। गफ्फार खान के खुदाई खिदमतगार और कांग्रेस ने स्वाधीनता के संघर्ष दोनों का मकसक बहुत सामान था इसलिए दोनों ने एक-दूसरे का साथ निभाया। बादशाह खान खुद कांग्रेस के सदस्य बन गए थे। कई मौकों पर जब कांग्रेस के विचारो और गाँधी जी के विचारो में मतभेद होता तब गफ्फार खान गाँधी के साथ खड़े दिखते। वो कई सालों तक कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य रहे पर उन्होंने अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया।

देश विभाजन और बादशाह खान

बादशाह खान का विचार सभी धर्मो के मानाने वालो को एक साथ लेन का था वो एक धर्मनिरपेक्ष इंसान थे इस नाते गफ्फार खान ने हमेशा ही भारत के विभाजन का विरोध किया जिसके कारण लोगों ने उन्हें मुस्लिम-विरोधी भी कहा ! इन वजहों से कुछ लोग उनसे नफरत भी करते थे और 1946 में पेशावर में उनपर जानलेवा हमला भी हुआ। जब कांग्रेस भारत का विभाजन रोकने में असफल रही तब गफ्फार खान बहुत आहत हुए।

सन 1947 में जब ‘खईबर-पख्तुन्ख्वा’ को पाकिस्तान में शामिल होने के मसले पर जनमत संग्रह कराया गया तब बादशाह खान ने इसका पुरज़ोर विरोध किया ,कांग्रेस भी इसका विरोध कर रही थी दोनों ने जनमत संग्रह में शामिल होने से इनकार कर दिया जिसके परिणामस्वरुप ‘खईबर-पख्तुन्ख्वा’ ने बहुमत से पाकिस्तान में शामिल होने के पक्ष में मत दिया।

पकिस्तान के साथ संबंध

जब देश का बटवारा हुया गफ्फार खान इससे बहुत आहात हुए ! बंटवारे के बाद उन्होंने पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय लिया और देश के प्रति अपनी निष्ठा भी प्रकट की लेकिन पाकिस्तानी हुकुमत को उनकी निष्ठा पर सदैव संदेह रहा। उनकी बदकिस्मती ये रही की इस महान देशभक्त और स्वतंत्राता सेनानी की इच्छाओं को पाकिस्तान की सरकार ने इनके आज़ादी में इनके योगदान को अनसुना कर दिया और सरकार खान एवं उनके समर्थकों को पाकिस्तान की विकास और प्रगति में बाधा मानते रहे।

पाकिस्तान में उन्हें शक की नज़र से देखा जाने लगा और आने वाली सारी सरकारों ने उन्हें या तो घर में नजरबन्द रखा या जेल में रखा। इलाज के लिए वो कुछ समय के लिए इंग्लैंड गए और फिर वहां से अफगानिस्तान चले गए।  लगभग 8 सालों तक निर्वासित जीवन बिताने के बाद 1972 में वो वापस लौटे पर बेनजीर भुट्टो सरकार ने उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया।

निधन

पाक़िस्तान में ज़्यादा समय उनका जेल में या घर में नज़रबंद रहने में बिता साल 1988 में जब वो पाक़िस्तान सरकार दुवारा उन्हें पेशावर में उनके घर में नज़रबंद किया गया था उन्होंने इन दुनिए को अलविदा कह दिया । 20 जनवरी 1988 को उनकी मृत्यु हो गयी और उनकी अंतिम इक्षा थी जलालाबाद अफ़ग़ानिस्तान में दफ़नाया जाये ऐसा सा ही किया गया । उनके अंतिम संस्कार में 2 लाख से भी ज्यादा लोग शामिल हुए जो उनके महान व्यक्तित्व का परिचायक था।

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