Shocking story - बेटे को बनाया इंजीनियर पर , खुद को कंकाल होने से न बचा पाई , एक बार पढ़िए ये आपके साथ भी हो सकता है

A decomposed body of a 63-year-old was found at her home in Oshiwara . No one knew about the death till her son arrived -
मुंबई से एक दिल दहला देने वाली घबर सामने आयी है ! जिसने हम सब को सोचने पर मज़बूर कर दिया है !

अगर माँ ना होती तो हम ना होते

#आशा_सहनी जी की मौत की रूह कांपने वाली खबर अधिकतर ने आज नहीं पढ़ी होगी। क्योंकि उस खबर में मसाला नहीं था। खबर नहीं पढ़ने या पढ़कर इग्नोर करने की एक और वजह थी- उसमें हम सब आईने में अपनी तस्वीर देखने का साहस न उठा पाते।
खैर,बात पहले आशा सहनी की।
80 साल की आशा सहनी मुंबई के पॉश इलाके में 10 वी मंजिल पर एक अपार्टमेंट में अकेले रहती थी। उसके पति की मौत चार साल पहले हो गयी। अकेले क्यों रहती थी? क्योंकि उसका अकेला बेटा अमेरिका में डॉलर कमाता था। बिजी था। उसके लिए आशा सहनी डेथ लाइन में खड़ी एक बोझ ही थी। उसके लाइफ फारमेट में आशा सहनी फिट नहीं बैठती थी।
ऐसा कहने के पीछे मजबूत आधार है। बेटे ने अंतिम बार 23 अप्रैल 2016 को अपनी मां को फोन किया था। ह्वाटसअपर पर बात भी हुई थी। मां ने कहा-अब अकेले घर में नहीं रह पाती हूं। अमेरिका बुला लो। अगर वहीं नहीं ले जा सकते हो तो ओल्ड एज ही होम ही भेज दो अकेले नहीं रह पाती हूं।
बेटे ने कहा-बहुत जल्द वह आ रहा है।
कुल मिलकार डॉलर कमाते बेटे के लिए अपनी मां से बस इतना सा लगाव था कि उसके मरने के बाद अंधेरी का महंगा अपार्टमेंट उसे मिले। जाहिर है इसके लिए बीच-बीच में मतलब कुछ महीनों पर आशा सहनी की खैरियत ले लिया करता था जो उसकी मजबूरी थी। अंदर की इच्छा नहीं। हर महीने कुछ डॉलर को रुपये में चेंज कराकर जरूर बीच-बीच में भेज दिया करता था।

चूंकि उसे इस साल अगस्त में आना था, तो उसने 23 अप्रैल 2016 के बाद मां को फोन करने की जरूरत नहीं समझी। वह 6 अगस्त को मुंबई आया। कोई टूर टाइम प्रोग्राम था। बेटे ने अपना फर्ज निभाते हुए, आशा सहनी पर उपकार करते हुए उनसे मिलने का वक्त निकालने का प्रोग्राम बनाया। उनसे मिलने अंधेरी के अपार्टमेंट गये। बेल बजायी। कोई रिस्पांस नहीं... लगा, बूढी मां सो गयी होगी। एक घंटे तक जब कोई मूवमेंट नहीं हुई तो लोगों को बुलाया। पता चलने पर पुलिस भी आ गयी। गेट खुला तो सभी हैरान रहे। आशा सहनी की जगह उसकी कंकाल पड़ी थी। बेड के नीचे। शरीर तो गल ही चुका था, कंकाल भी पुराना हो चला था। जांच में यह बात सामने आ रही है कि आशा सहनी की मौत कम से कम 8-10 महीने पहले हो गयी होगी। यह अंदाजा लगा कि खुद को घसीटते हुए गेट खोलने की कोशिश की होगी लेकिन बूढ़ा शरीर ऐसा नहीं कर सका। लाश की दुर्गंध इसलिए नहीं फैली कि दसवें तल्ले पर उनका अपना दो फ्लैट था। बंद फ्लैट से बाहर गंध नहीं आ सकी।
बेटे ने अंतिम बार अप्रैल 2016 मे बात होने की बात ऐसे की मानो वह अपनी मां से कितना रेगुलर टच में था। जाहिर है आशा सहनी ने अपने अपार्टमेंट में या दूसरे रिश्तेदार से संपर्क इसलिए काट दिया होगा कि जब उसके बेटे के लिए ही वह बोझ थी तो बाकी क्यों उनकी परवाह करेंगे।
वह मर गयी। उसे अंतिम यात्रा भी नसीब नहीं हुई।
आशा सहनी की कहानी से डरये। जो अाज आशा सहनी के बेटों की भूमिका में है वह भी डरें,क्योंकि कल वह आशा सहनी बनेंगे। और अगर आप किसी आशा सहनी को जानते हैं तो उन्हें बचा लें।
पिछले दिनों इकोनॉमिस्ट ने एक कवर स्टेारी की थी। उसके अनुसार इस सदी की सबसे बड़ी बीमारी और सबसे बड़ा कष्ट सामने आ रहा है-मृ़त्यू का इंतजार। उसके आंकड़ा देकर बताया कि किस तरह यूरोप,अमेरिका जैसे देशा में मृत्यू का इंतजार सबसे बड़े ट्रामा बन रहा है। मेडिकल-इलाज और दूसरे साधन से इंसान की उम्र बढ़ी लेकिन अकेले लड़ने की क्षमता उतनी ही रही। मृत्यू का इंतजार आशा सहनी जैसे लोगों के लिए सबसे बड़ा कष्ट है। लेकिन मृत्यू और जीवन सबसे बड़ा लेवल करने वाला फैक्टर है। यह एक साइकिल है। आशा सहनी एक नियति है। कीमत है विकास की। कीमत है अपग्रेडेशन की। कीमत है उस एरोगेंस की जब कई लोगों को लगता है कि वक्त उनके लिए ठहर कर रहेगा।

Narendra Nath जी की वॉल से साभार।

Sahani mumbai

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