चाणक्य के अनमोल वचन part 2

मौर्य साम्राज्य के संस्थापक और कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री जिनकी नीतिया आज भी बड़े बड़े विदवानों के लिए ज्ञान का स्रोत हैं

अपनी हैसियत के ऊपर या निचे हैसियत वालो से दोस्ती न करो 
इस तरह की दोस्ती तुम्हे कभी ख़ुशी नहीं देगी 


Never make friends with people who are above or below you in status. Such friendships will never give you any happiness.

चाणक्य एक परिचय ?

चाणक्य मौर्य साम्राज्य के संस्थापक और कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री थे। वे ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य का यह संस्थापक कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्‍यात हुआ। वे प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने भारतीय राजनीति में कूटनीतिक जोड़-तोड़, दांव-पेंचों की शतरंजी चालों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया।  इतनी समय बीतने के बाद आज भी चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत ‍और नीतियाँ का प्रयोग होता है उनकी नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्‍ययन, चिंतन और जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्‍देश्य से अभिव्यक्त किया। चाणक्य भौतिक कूटनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक अर्थशास्त्री भी थे।

चाणक्य का जन्म ईसा से 300 वर्ष पूर्व ऋषि चणक के पुत्र के रूप में हुआ। वही उनके आरंभिक काल के गुरु थे। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि चणक केवल उनके गुरु थे। चणक के ही शिष्य होने के नाते उनका नाम चाणक्य पड़ा। उस समय का कोई प्रामाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं है। इतिहासकारों ने प्राप्त सूचनाओं के आधार पर अपनी-अपनी धारणाएं बनाई। 14 वर्ष के अध्ययन के बाद 26 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी समाजशास्त्र, राजनीती और अर्थशास्त्र की शिक्षा पूर्ण की और नालंदा में उन्होंने शिक्षण कार्य भी किया, वे पढ़ाई मे मेधावी छात्र थे , चाणक्य के बचपन का युग राजनीतिक उथल-पुथल का युग था ! चारों ओर अराजकता फैली थी। लोगों का जीवन असुरक्षित था। उन पर शोषण की मार पड़ती ही रहती थी। चाणक्या राजतंत्र के प्रबल समर्थक थे ! इस युग में राजा गरीब जनता पर ज़ुल्म करते थे और उनका शोषण करते थे ! चाणक्या को ये वयवस्था बहुत चिंतित करती थी ! 

कहा जाता है एक बार पाटलिपुत्र के राजा नंद या महानंद के यहाँ कोई यज्ञ था। उसमें चाणक्या भी गए और भोजन के समय एक प्रधान आसन पर जा बैठे। महाराज नंद ने इनका काला रंग देख इन्हें आसन पर से उठवा दिया।, तभी उन्होंने नंद – वंश के विनाश का बीड़ा उठाया था। इसके बाद उन्होंने अपनी कूटनीति से चन्द्रगुप्त मौर्य को राजगद्दी पर बैठा कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली तथा नंद – वंश को मिटाकर मौर्य वंश की स्थापना की और नंद – वंश के अत्याचारों से पीड़ित प्रजा को भी मुक्ति दिलाई।

मृत्युं:-  ईसा.पूर्व. 225 

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